Tuesday, 16 January 2018

उत्तर ( डॉ वी एन पाल )



उत्तर ( डॉ वी एन पाल )

श्री राकेश झा जी
वरिष्ठ परियोजना अधिकारी जी ,
UPSIDC -कानपुर
मान्यवर ,
आपने हमारे एक पत्र दिनांक 26-12-17 को पुन: सज्ञान में लिया l इसके लिए आपको बहुत बहुत साधुवाद l आपने जो भी जानकारियां दीं हैं सभी भ्रामक/ अर्द्ध सत्य हैं तथ्यों को छिपाया गया है भूमि अधिग्रहण अधिनियम अनुपालन की कार्यवाही विधिबत नहीं हुई है l तत्कालीन मंडल आयुक्त श्री विजय शकर पांडे का आदेश १७-०६-०८ एवं श्री शिवाकांत ओझा अपर आयुक्त प्रशासन कृते आयुक्त के निर्देश पत्र ०८-०८-०८ का अवलोकन करें जिनमे भूमि के अर्जन की प्रक्रिया को निरस्त करते हुए तत्कालीन जिला प्रशासन को कास्तकारों की जमीने उनके नाम नामांतरित करके फोन / फैक्स से सूचित करने के आदेश / निर्देश किये गये थे l उनके आदेशों / निर्देशों के सम्मान में सहयोग करें l कतिपय बोर्ड / कार्यालय एवं अन्य गतिविधियाँ तत्काल प्रभाव से बंद करने के हम संप्रभु नागरिकों के आदेश का पालन करें l माननीय न्यायालय में जाने का सुझाव हास्यास्पद है क्योंकि यह हमे भी पता है और पत्र में आपको आगाह भी किया गया है l बिन्दुबार आपके स्पष्टीकरण पर आपका ध्यान आकर्षित हो l
1- 15 वर्ष पहले तथाकथित SEZ कानपुर के नाम पर तत्काल की धारा ४ के अंतर्गत दो वर्षों तक अधिसूचनाए जारी होती रहीं l यह जिला उन्नाव के सुनियोजित औद्योगिक विकास की परिकल्पना --जिला प्रशासन को गुमराह कर किसानों को तबाह कर सिर्फ और सिर्फ भूमि बैंक बनाने का खेल नहीं था तो क्या ? आपके अपने पत्र 24-10-17 से अवगत होने का कष्ट करें l आश्चर्यचकित हूँ कि अभी तक ट्रांस गंगा सिटी हेतु भूमि अधिग्रहण की अधिसूचना की कार्यवाही क्यों नहीं हुयी ?
2- 14 वर्ष पहले धारा ६/१७ की अधिसूचना की कार्यवाही दो वर्ष चली l आपने किसी भी अधिसूचना की कोई प्रति उपलब्ध नहीं करायी है l सुनियोजित औद्योगिक विकास किया जा सकता है - से आपका क्या अभिप्राय है ? जमीनों का अधिग्रहण निगम ने किया है या जिलाप्रशासन ने ? पहली वार्ता जो साईट ऑफिस में हुयी थी जिसमे आपने कहा था कि हमने जमीने किसानों से नहीं ली हैं l तब भूमि अधिग्रहण अधिनियम अनुपालन की फाइल व् जिस काम / योजना के लिए जमीन ली गयी है की फाइल के साथ जिसने किसानों से जमीने ली हैं से बात की जायेगी l हुयी थी l कोई भी अभी तक दोनों फाइलें लेकर सामने नहीं आया l
3- आयुक्त लखनऊ ने दि २८-०७-०८ को 1.51 की जगह पर 5.51 लाख के अनुमोदन के वावजूद भी अंतिम रूप से अपर आयुक्त प्रशासन श्री शिवाकांत ओझा के पत्र ०८-०८-०८ में तत्कालीन जिला प्रशासन को कास्तकारों की जमीने उनके नाम नामांतरित करके फोन / फैक्स से सूचित करने के आदेश / निर्देश किये गये थे का जिला प्रशासन ने अनुपालन क्यूँ नहीं किया ?
4-लगभग 6 साल वाद २७-0१-१४ को किया गया जिसका अनुमोदन ३१-०७-१४ को जबकि इसी बीच नया अधिनियम 01-01-14 को लागु हो गया था - तथाकथित समझोता भी सवालों के घेरे में --5.51 से 12.51लाख प्रति बीघा क्यों किया गया ? कौन दोषी है ? बार बार करार किसने तोड़े और क्यों तोड़े गये ? सभी करार किसानों और जिला प्रशासन के बीच होने चाहिए थे या UPSIDC और दलालों के बीच? जो भी करार हुए वह सभी काल बाधित हो गये l किसने किसे नामित किया ? समझौता किसी से जमीने किसी की l
5- आश्चर्य चकित हूँ की अभी तक किसानों का भुगतान किया जा रहा है यानि कि आखिरी तथाकथित फर्जी समझौता भी कालबाधित हो गया l
हास्यास्पद है कि जिन्हें भुगतान नहीं हुआ उसकी सूची उपलब्ध कराने की अपेक्षा हमसे की जा रही है l जिला प्रशासन के पास सभी रिकॉर्ड होंगे l हीरेन्द्र निगम / सनोज यादव के शपथ पत्र किस परियोजना के लिए कब दिए गये ? किसानों की राष्ट्रभक्ति जगजाहिर है फिर भी उनके ऊपर झूंठे मुकद्दमे समय समय पर दर्ज कराए जा रहे हैं उन्हें आतंकवादी मानकर सुरक्षाबल की मांग का औचित्य समझ से परे है l
6-योजना बदलने पर अधिग्रहण की कारवाही फिर से की जानी चाहिए l SEZ कानपुर के लिए अधिग्रहण कालान्तर में Trans Ganga City परियोजना --किसानों को अँधेरे में रखकर -- का औचित्य क्या ? किसान विकास के साथ है और रहेगा पर यहाँ का किसान अपनी तबाही को भोग रहा है -मुठ्ठीभर भर का विकास एक बड़ी आबादी की तबाही की कीमत पर -उनका पीढ़ी दर पीढ़ी का तानाबाना ध्वस्त करके- विकास की परिभाषा क्या है ? जो उदहारण प्रस्तुत किये उनकी सच्चाई किसी से छिपी नहीं है आपकी अधिकांश योजनाये अधर में क्यों ?
7- लिखित स्वीकारोक्ति --यह नोटिफिकेशन भूमि के अर्जन की अधिसूचना से भिन्न है - विसंगतियों से परिपूर्ण है UPSIDA की अधिसूचना से किसानों का लेना देना क्या ? भारत सरकार के पी जी पोर्टल पर भूमि के अर्जन की अधिसूचना के बारे में जानकारी चाही गयी थी l
आपके अनुरोध पर सभी काश्तकारों को सही सही सूचनाओं से ही अवगत कराया जा रहा है कि किस प्रकार आपके उपक्रम के तत्कालीन अधिकारीयों ने जिलाप्रशासंन को गुमराह करके किसानों को तबाह करने का काम न केवल यहाँ वल्कि पूरे प्रदेश में यथा मंधना ,रूमा आदि सब जगह किया है l प्रदेश सरकार की संपत्ति को कतिपय अधिकारिओं ने परम्परागत तरीके से आदतन स्वार्थपरकपूर्ति हेतु चूना लगाया l हमेशा लगाते रहे हैं , लगाते रहेंगे यदि उन पर अंकुश न लगाया गया l यहाँ का मामला पकड़ में आ गया है किसानों की जमीनों का यह घोटाला पूरे देश के लिए नजीर होगी l सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने एक निर्णय में कहा है कि जमीन किसान की माँ के समान है जन आन्दोलन ही एक मात्र रास्ता है जहाँ तक कीमत की जगह मुआवजे की राशि का प्रश्न है यह जिसने गलती की है उसे ही भुगतना है और फिर सरकार की संपत्ति तो जनता की ही संपत्ति है सरकार को जनता की परिवरिश करने की जिम्मेदारी भी है l उसे तबाह करने का अधिकार किसने दिया ? प्रदेश सरकार की संपत्ति का दुरुपयोग कौन कर रहा है ? शासन /प्रशासन में बैठे हमारे आपके जैसे लोग l किसानों को आन्दोलन करने के लिए किसने विवश किया ? यह भी एक गंभीर विषय है इसकी क्षतिपूर्ति कौन करेगा ? निष्पक्ष जांच में स्वाभाविक तौर पर सरकारी भूमाफिया हैं UPSIDC , KDA जैसे अन्य उपक्रम पूरे देश में l परिणाम भुगतने को तैयार रहिये l सरकार भूमाफियाओं से निपट रही है और यहाँ का किसान आन्दोलन -सरकारी भूमाफियाओं से l आप किसानो को ज्यादा से ज्यादा देते रहे हमे कोई आपत्ति नहीं -विवश होकर दबाब में विकल्प के अभाव में लेना ही पड़ेगा l हमारा पूरा सहयोग रहेगा l किसानों की जमीन का अधिग्रहण अधिनियम के अनुपालन के साथ तथा जिस योजना के लिए जमीन ली गयी है वही योजना लाइए , किसान सहयोग करने को तैयार है l आपको देखना है कि क्या ऐसा हुआ है l यदि नहीं तो किसानों की मदद/सहयोग करे l जमीने उनके नाम करे l जिलाधिकारी श्री रविकुमार एन जी कासुझाव पुरानी बातों पर पर्दा डाल कर नये सिरे से रचनात्मक प्रस्ताव लायें जिस पर सभी मिल बैठकर विचार करें l आप स्वयम पीड़ित किसान होते तो कैसा महसूस करते और क्या करते ? शासन सत्ता की ताकत पर किसानों की तबाही का खेल अब खत्म होना चाहिए कि नहीं ? जरा सोचिये और पूछिए/सुनिए अपनी अंतरात्मा की आवाज l
तत्कालीन मंडल आयुक्त श्री विजय शंकर पांडे के आदेश पत्र दिनांक १७-०६-०८ / अपर आयुक्त प्रशासन कृते आयुक्त श्री शिवाकांत ओझा के निर्देश पत्र दिनाक ०८-०८-०८ पर जमीने किसानों की ही हैं l और किसी को भी किसानों की जमीनों पर किसी तरह की योजना तो दूर की बात है उनकी अनुमति के बिना यहाँ तक कि मुझे(डॉ पाल ,----आदि को ) भी खड़े होने का अधिकार नहीं है l अत:आपको पहले अनुरोध किया जाता है फिर अधिकार के साथ आदेश किया जाता है कि आप अपनी सम्पूर्ण गतिविधियों को तत्काल प्रभाव से विराम दें अन्यथा की स्थिति में सारी जिम्मेदारी आपकी होगी l एक रुका हुआ फैसला लागू करें या फिर किसानों को मौत के घाट उतार दें जब कहेंगे वे धरना स्थल पर पंक्ति में खड़ा हो जांएगे -सीमा पर देश की रक्षा करते हुए जिस तरह से जवान शहीद हो जाता है और उसके परिवार को शहीद होने का प्रतिफल मिलता है उसी तर्ज पर अब किसान भी अपनी जमीने अपनी पीढ़ी को बचाने के लिए शहीद होने का दर्जा प्राप्त करने को तैयार है -
अविलम्ब प्रभावी कार्यवाही अपेक्षित l
आपका शुभेक्षु ---
श्रीमती सम्पत पाल -राष्ट्रीय कमांडर गुलाबी गैंग
डॉ विजय नारायण पाल एवं अन्य संप्रभुगण ,पीड़ित किसान
9335193898 ,8009152345,9616462949
नोट- 1-बहु फसली कृषि योग्य उपजाऊ भूमि न तो किसान दे सकता है और न कोई उपक्रम ले सकता है -अख़बारों में अधिसूचना पहले - service दबाब में बाद में - जमीने नामांतरित पहले / कीमत की जगह मुआवजा बाद में - फिर सालों जमीने खाली पड़ी रखना - भूमि बैंक बनाने का खेल और वह भी किसानों के बेटों (शासन सत्ता में बैठे जिम्मेदार ) ने किया जो किसी राष्ट्र द्रोह से कम नहीं है l अंग्रेज तो राष्ट्रहित में तत्काल की धारा का प्रयोग करता था अब फैशन बन गया है हर तथाकथित सरकारी उपक्रमों का -
2-UPSIDC ने धनराशि जिला प्रशासन को दी है न कि किसानों को और किसानों को जिला प्रशासन ने-किसानों और आप को मिलकर जिलाधिकारी से- तत्काल से लेकर अबसे पहले के जिम्मेदार जिलाप्रशासन /UPSIDC के अधिकारिओं द्वारा की गयी साजिस का पर्दाफास करने में अहम भूमिका निभाना चाहिए l

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