Saturday, 8 April 2017

संवैधानिक पदों पर विराजमान व्यक्तियों के औचित्य पर सवालिया निशान ?

कृपया -संलग्न सारणी का अवलोकन करें -

स्पष्ट है कि राष्ट्रपति के चुनाव 1981 के वाद से लेकर 2012 तक 1971 की जनगणना (जन संख्या 54932005)पर कराये जा रहे हैं 2017 में भी होंगे और 2027 से पहले तक होते रहेंगे l हर 10 सालों में आबादी बढती रही चुनाव योग सोता रहा l ५५ करोड़ की आबादी पर चुनाव कराता रहा २०२७ से पहले तक कराता रहेगा l२००७ में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में हिस्सा लिया था l तब इस विसंगति पर चुनाव आयोग का ध्यान आकर्षित किया था l उसके कान में जून नहीं रेंगी l विवश हो कर सर्वोच्च् न्यायालय की शरण में राष्ट्रपति के चुनाव पर सवालिया निशाँन लगाया गया था
उसने (CJI-Mr K G Balakrishanan की खंडपीठ ) भी इस भूल सुधार को संज्ञान में नहीं लिया था और matter list न करके matter over कह कर मेरी याचिका को ख़ारिज कर दिया था 17 अगस्त २००७ को l मैं ठगा सा रह गया था लगभग 70 करोड़ जनता को राष्ट्रपति के चुनाव में भाग ही नहीं लेने दिया गया
ऐसा इसलिए किया गया ताकि संवैधानिक संकट पैदा होने से बचा जा सके --राष्ट्रपति का चुनाव असंवैधानिक करार होने पर उसके द्वारा नियुक्त CJI सहित सभी संवैधानिक नियुक्तियां जैसे प्रधानमंत्री, राज्यपालों व चुनाव आयुक्त आदि अवैध हो जाती l उन्हें तत्काल अपने पदों से हटना पड़ता ,लिए गये सभी लाभ वापस करने पड़ते l कालान्तर में भी इस भूल को न तो संज्ञा में लिया जा रहा है और न हीं सुधारा गया l यह एक गभीर विसंगति है l

मेरे कुछ यक्ष्य प्रश्न --
चुनाव में किसी के फार्म में spelling की गलती पर पर्चा निरस्त हो जाता है रद्द हो जाता है यह तो बहुत बड़ी गलती है कौन जिम्मेदार ?
- क्या संवैधानिक पदों पर विराजमान लोगों के औचित्य पर सवालिया निशाँन लगाया जा सकता है ?

यदि हाँ -

तो फिर दोषी कौन ?
और ऐसे लोगो के प्रति संवैधानिक क्या कदम उठाये जांय ?

डॉ वी एन पाल

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